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बिहार में बहार

बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है अभियोजन लाचार है, सामाजिक न्याय की सरकार है। अद्भुत वहां भागलपुर का कारागार है फ्रेश होकर निकलता जहां से गुनहगार है। स्वागत में खड़ी वहां राज्य की सरकार है फिर गाड़ियों के काफिले पे रॉबिनहुड सवार है। तीन बेटों को खो चुका वो बूढ़ा लाचार है उसकी आवाज़ सत्ता तक नहीं असरदार है। सिवान में बना हुआ भव्य तोरणद्वार है कहाँ गए पापा, राजदेव के बच्चों की पुकार है। ये कैसी बहार है, ये कैसी सरकार है? 'परिस्थतियों के सीएम' धिक्कार है, धिक्कार है।

इमरजेंसी के बहाने

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25 जून का लेख एक दिन लेट  पोस्ट कर रहा हूं आज 25 जून है। एक घंटे बाद 26 जून हो जायेगा। उम्मीद है कि राजसत्ता ऐसा कुछ नहीं करेगी कि सुबह का उजाला अँधियारा लेकर आये। लेकिन 41 साल पहले 26 जून की सुबह रात से भी काली थी। इमरजेंसी लग चुकी थी। इमरजेंसी किसने लगाई ये सबको पता था लेकिन इंदिरा गांधी ने all india radio पर दिए अपने सम्बोधन में कहा था कि राष्ट्रपति के आदेश पर आपातकाल लगाया गया है। उन्होंने लोगों से नहीं घबराने की अपील की थी। लोग वाकई घबराये नहीं थे बल्कि करीब दो साल तक लड़ते रहे थे। चुनाव में जनता ने अपनी ताकत दिखा दी थी। जनता के नायक जेपी ने इस लड़ाई में जाति तोड़ो का भी नारा दिया और कई लोगों ने नाम के आगे से जातिसूचक सरनेम हटा दिया था। शायद संघर्ष वाहिनी में जाने की यह जरूरी शर्त थी। 1990 में विहार विधानसभा से कांग्रेस का सफाया हो गया और जेपी के सिपहसालार सत्ता पर काबिज़ हुए। हालाँकि जाति की राजनीति करने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं थी। जेपी सामाजिक छेत्र में परिवर्तन को सम्पूर्ण क्रांति का एक हिस्सा मानते थे और सत्ताधीश सामाजिक न्याय का फलसफा लेकर आये थे।...