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सुतल पिया के जगावे हो रामा, तोर मीठी बोलिया

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जब बधार (खेत) में सरसों और तीसी नई उमंग से गलबहियां करने लगती हैं, जब नीम और पीपल में नए पत्ते आ जाते हैं, जब आम नया मौर पहन लेता है, जब महुए की खुशबू नई मादकता फैलाने लगती है, जब गेहूं और कान की बालियां नए अंदाज में मचलने लगती हैं, जब चना मानों नए हिप्पी कट हेयर स्टाइल में बिंदास झूमने लगता है, जब अनाज के रूप में घर में नई सुख-समृद्धि आने लगती है और परदेसी प्रियतम की याद नए सिरे से सताने लगती है, तब शब्द वेदना में डूबकर फूट पड़ते हैं चैता के रूप में, 'ए रामा पिया परदेसवा' फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने चर्चित उपन्यास 'मैला आंचल' में एक चैती का जिक्र किया है, सुतल पिया के जगावे हो रामा तोर मीठी बोलिया'। इसका मतलब यह कि नायक सो रहा है। सुबह हो गई है और कोयल की मीठी तान सुनाई दे रही है। नायिका कोयल पर लानत भेजती है कि उस कूक से उसके पति की नींद खुल जाएगी। फिर? फिर वह उससे अलग होकर अनाज काटने खेतों में चला जाएगा। नायिका यही नहीं चाहती। कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि मुंह अंधेरे खेतों में जाने की क्या जरूरत है? थोड़ा रुककर भी तो जा सकता है। जो लोग दरअसल खेती के बारे में...

रांची जेल की खैनी पार्टी

कई साल पहले बोस्टन की टी पार्टी हुई थी, जिसका इतिहास की किताबों में जिक्र है। उसके कई साल बाद दिल्ली की तिहाड़ जेल में कलमाडी की टी पार्टी हुई थी, जिसका जिक्र तत्कालीन मीडिया रिपोर्ट्स में है। अब वक्त याद रखेगा बिरसा मुंडा जेल में हुए एकल खैनी स्वादन के लिए। हालांकि इस मामले को मीडिया में खैनी की तरह ही हल्के में लिया जा रहा है, जबकि इसका किरदार काफी वजनी है। इस खैनी कांड के किरदार पर 900 करोड़ से अधिक के पशुपालन घोटाले में शामिल होने का आरोप है। कई म ामलों में दोष साबित हो चुका है और एक में सजा भी हो चुकी है। सवाल यह है कि क्या जेल में बाहर से कोई भी चीज भेजी जा सकती है? आज खैनी, कल गांजा, परसों भांग, फिर स्मैक, चरस कुछ भी भेज दो। फिर जेलों के अंदर बार--बार तलाशी क्यों ली जाती है नशीले पदार्थों की। या खैनी को परम तत्व मानते हुए छुूट दी गई है। बचपन में खैनी पर सुनी एक कविता याद आ रही है हम काहें खइनी खाइना? एक दिन बीच सभा में बइठल रहनी खइनी लेके अइंठत रहनी जब दुख बुझाइल दूना त पाकिट में से कढनी चूना आ ओकरा के खैनी में मिलाय तब देनी मुंह में पठाय भर मुंहे जब थूक ...

सामाजिक न्याय या नव सामंतवाद

सोशल साइट्स पर ऐसी भी पोस्ट दिख रही हैं कि चारा घोटाले, हालांकि इसे पशुपालन घोटाला कहना ज्यादा सही है, में लालू यादव को सिर्फ इसलिए दोषी ठहराया गया है, क्योंकि वह पिछड़ी जाति ...

सिर्फ तुकबंदी नहीं हैं छठ के गीत

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छठ, लोक आस्था का महापर्व। जाहिर है इस पर्व पर लोक कंठों से फूटने वाले गीत सिर्फ तुकबंदी तो होंगे नहीं। पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जा रहे छठ के सारगर्भित गीतों का यदि हम मतलब और मकसद समझ लें, तो समझिए छठ माता की पूजा करने जितना पुण्य मिल गया। यह बात प्रचलित है कि छठ बेटों का त्योहार है। पुत्र प्राप्ति की इच्छा के साथ और पुत्र प्राप्ति के बाद कृतज्ञता जताने के लिए यह व्रत किया जाता है। लेकिन, छठ के गीत इससे पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखते। कई गानों में बेटियों की कामना की गई है। ऐसा ही एक गीत है - पांच पुत्तर, अन्न-धन लक्ष्मी, धियवा (बेटी) मंगबो जरूर । यानी बेटे और धन-धान्य की कामना तो की गई है, लेकिन उसमें यह बात भी है कि छठ माता से बेटी जरूर मांगना है। यह 'जरूर' शब्द साबित करता है कि बेटियों को लेकर छठ पूजा करने वाले समाज ने बेटों और बेटियों में फर्क नहीं किया। एक और गीत यूं है कि रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला पढ़ल पंडितवा दामाद, हे छठी मइया...। संभवत: ये गीत स्त्री कंठों से फूटे थे और आज भी छठ के मौके पर आमतौर पर महिलाएं ही इन गीतों को गाती हैं, जबकि व्रतियों में पुरुष भी होते हैं। दाद दीजि...