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केलवा के पात पर उगेले सुरुज देव

छठ शुद्ध रूप से प्रकृति की पूजा का पर्व है। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखाने का अवसर, लेकिन किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं। सूर्य की पूजा का मौका (जिन्हें एकमात्र ऐसा भगवान मा...

कलपेली भींजल तिवइया हो, उगीं हे दीनानाथ!

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ऐ खुदा थोड़ी करम फ़रमाई होना चाहिये इतनी बहनें हैं तो एक भाई होना चाहिए मुनव्वर राणा के इस शेर का कितने 'क्रांतिकारियों' ने विरोध किया ? यदि नहीं तो छठ में ही फॉल्ट क्यों ढूंढ रहे हैं कि यह बेटे का त्योहार है? यह क्यों नहीं मानते कि यह त्योहार सिस्टम को चैलेंज करता है। किसी पुरोहित की जरूरत नहीं, किसी मंत्र की आवश्यक्ता नहीं, किसी मुहूर्त का झंझट नहीं, किसी दक्षिणा की बाध्यता नहीं। खुदा और बन्दे के बीच किसी मुहम्मद की अनिवार्यता नहीं। साक्षात सूर्य और उनके उपासक। इससे बड़ी क्रांति हुई है कभी। और जो लोग रो रहे हैं कि इस पूजा का भी सारा दायित्व महिलाओं पर है वे यह सोचें कि उन असूर्यमपश्या महिलाओं के अंदर विरोध की कितनी चिनगारी थी। वे महिलाएं इनकी तरह सिर्फ गालवीर या कलमवीर नहीं थीं। छठ के गीतों की फिलॉसफी समझिए। गेहूं खरीदने से लेकर नदी किनारे घाट बनवाने और सुबह सूर्य से जल्दी उदित होने की आरजू। ये गीत ऊर्जा देते हैं। कभी पपड़ाये होठों और पानी में कांपते कण्ठों से फूटने वाले गीत, कल्पेली भीजल तिवईया हो उगीं हे दीनानाथ, सुनिए और इस हठ और विनय को समझिए, पता चलेगा कि साध्य को हासिल ...

सिर्फ तुकबंदी नहीं हैं छठ के गीत

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छठ, लोक आस्था का महापर्व। जाहिर है इस पर्व पर लोक कंठों से फूटने वाले गीत सिर्फ तुकबंदी तो होंगे नहीं। पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जा रहे छठ के सारगर्भित गीतों का यदि हम मतलब और मकसद समझ लें, तो समझिए छठ माता की पूजा करने जितना पुण्य मिल गया। यह बात प्रचलित है कि छठ बेटों का त्योहार है। पुत्र प्राप्ति की इच्छा के साथ और पुत्र प्राप्ति के बाद कृतज्ञता जताने के लिए यह व्रत किया जाता है। लेकिन, छठ के गीत इससे पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखते। कई गानों में बेटियों की कामना की गई है। ऐसा ही एक गीत है - पांच पुत्तर, अन्न-धन लक्ष्मी, धियवा (बेटी) मंगबो जरूर । यानी बेटे और धन-धान्य की कामना तो की गई है, लेकिन उसमें यह बात भी है कि छठ माता से बेटी जरूर मांगना है। यह 'जरूर' शब्द साबित करता है कि बेटियों को लेकर छठ पूजा करने वाले समाज ने बेटों और बेटियों में फर्क नहीं किया। एक और गीत यूं है कि रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला पढ़ल पंडितवा दामाद, हे छठी मइया...। संभवत: ये गीत स्त्री कंठों से फूटे थे और आज भी छठ के मौके पर आमतौर पर महिलाएं ही इन गीतों को गाती हैं, जबकि व्रतियों में पुरुष भी होते हैं। दाद दीजि...