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योगी का राज : योगहठ बनाम राजहठ

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योगी आदित्यनाथ कैसे सीएम साबित होंगे यह तो वक़्त बताएगा, लेकिन उम्मीद के मुताबिक कई लोग परेशान जरूर हो गए हैं। विरोध भी शुरू होगा। सड़क पर भले न हो लेकिन परम्परागत और वैकल्पिक मीडिया में बगावत जरूर होगी। और अभी लगता है कि यही बीजेपी की रणनीतिक चाल होगी। इसी विरोध से निकलेगा जन समर्थन जो दिल्ली नगर निगम और आगामी विधानसभा के चुनावों में दिखेगा। विरोध क्यों योगी पर हिन्दू हितों की बात करने का आरोप है और इसी मुद्दे पर कई लोग उनका विरोध करते हैं। बीजेपी समर्थक कहते हैं कि इससे पहले यूपी में तो जाति-धर्म की ही राजनीति हो रही थी, फिर अचानक क्या कयामत आ गई? थोड़ा विषयान्तर भारतीय दर्शनों में चार्वाक सबसे पुराना है लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है कि यह दर्शन कब का है और इसके संस्थापक या प्रवर्तक कौन हैं। भारत में जो मोटे तौर पर 6 आस्तिक और 3 नास्तिक दर्शन (चार्वाक समेत) हैं उन सभी ने चार्वाक का निषेध किया है और यही विरोध चार्वाक दर्शन को स्थापित कराता है। यही स्ट्रैटिजी बीजेपी अपना रही है कि उसका इतना विरोध हो कि वोटर एकजुट रहें। सफल नहीं रहे सन्त बीजेपी जब मध्य प्रदेश म...

यूपी में पेट तक पहुंची नाक की लड़ाई

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 हाल में आए चुनावी नतीजों ने दो मुहावरों को अपडेट किया। अब इन्हें यू कहा जायेगा 1.खिसियानी बिल्ली ईवीएम नोचे 2.अरमानों पर झाड़ू फिरना खैर, 1995 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ था। नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव जैसे नेता जनता दल से अलग होकर 1994 में समता पार्टी बना चुके थे। मंडल कमीशन वाले हंगामे में लालू हीरो और विलेन दोनों बन चुके थे। जातिगत कमेंट्स चरम पर था। पहली बार बड़े पैमाने पर पैरामिलिटरी चुनाव में लगाई गई। किस इलाके से किसे कितने वोट मिले, इसे गोपनीय रखने के लिए काउंटिंग सेंटरों में एक हौदी बनवाई गई जिसमें सारे बैलेट बॉक्स पलट दिए जाते थे। इसके बाद हुई थी काउंटिंग। और जब नतीजे आये तो लालू अपने सहयोगी दलों के साथ जबरदस्त वापसी कर चुके थे। बिलकुल अभी जैसा माहौल था। लालू के विरोधी उन पर बैलेट बॉक्स बदलने का आरोप लगा रहे थे। कुछ का कहना था कि पोलिंग स्टेशन से स्ट्रांग रूम के रास्ते में ऐसा किया गया तो कुछ के पास ऐसी खुफिया खबरें थीं कि स्ट्रांग रूम की दीवारें तोड़कर बक्से बदल दिए गए। फिर पैरामिलिटरी क्या कर रही थी, इसके जवाब में वे कहते थे कि अफसर बिक...

गदहा की यारी में...

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सिंहासन बत्तीसी तक पहुंचने के लिए जिस तरह प्रेम पचीसी के बजाय गदहा पचीसी का सहारा लिया जा रहा है उससे इस भद्र जानवर को कितनी ख़ुशी हो रही होगी या दर्द हो रहा होगा ये फ़िलहाल पता नहीं। इस लौंडा पचीसी पर किसे दुलत्ती पड़ती है, यह तो 11 को पता चलेगा लेकिन फिलहाल तो गर्दभ पुराण का पाठ चालू है। किस गधे की वापसी? कृष्न चन्दर ने गधे पर 3 उपन्यास लिखे थे। 'एक गधे की आत्मकथा' 'एक गधे की वापसी' और 'एक गधा नेफा में'। अब यहाँ से कोई गधा नेफा में नहीं बल्कि नेपथ्य में जायेगा। किस गधे की वापसी होगी, फ़िलहाल तो इसका इंतजार ही ठीक रहेगा। एक लगातार दूसरी बार वापसी के लिये मचल रहा है तो दूसरा 14 साल का वनवास ख़त्म करने को व्याकुल है। गधा और घास गधा गर्मी में मोटा होता है और बारिश के दिनों में दुबला। यह विचित्र है। जब घास नहीं मिलती है तो गधा क्यों मोटा होता है। कहा जाता है कि गर्मी के दिनों में जब वह घास का एक-दो तिनका खाते हुए कई कोस तक चला जाता है और जब पीछे मुड़कर देखता है तो यह सोचकर तृप्त हो जाता है कि उसने इतने कोस की घास चर ली। मारे आत्मसंतुष्टि के उसकी खाल चिकनी ह...

एक है राजा, एक है रानी..

एक राज्य बहुत बड़ा। वहां समाजवादी सिस्टम में सामंतवाद पलता था और प्रजातंत्र के कंधे पर राजतन्त्र मचलता था। राजपरिवार साल में एक बड़ा जलसा करता था जिसमें स्वनामधन्य विभूतियां कूल्हे मटकाने पहुँचती थीं। सस्ते लोन पर प्रजा वहां खरीदारी कर सकती थी। कवि गण उसे भाषा में भदेस और कायर प्रदेश कहते थे। वहां का एक राजा था जिसके कई भाई और दो रानियां थीं। एक बाईचांस वाली और दूसरी बाईचॉइस वाली। और जैसा होता है बड़ी रानी की मौत हो गई। उसका एक बेटा था जिसे लोकलाज के भय से राजा ने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। लेकिन यह बात राजा की दूसरी रानी यानी पटरानी पचा नहीं पा रही थी। उसने भी राजा के लिए बरसों तक 'साधना ' की थी और दोनों के खामोश प्यार का 'प्रतीक ' एक बेटा भी था। तो पटरानी को लगा कि राजा ने तो उसके बेटे के लिए कुछ किया ही नहीं। फिर अचानक ऐसा ववंडर आया कि कोई किसी के कहने में नहीं रहा। सभी राजा की दुहाई देते रहे और उसी के सामने पटका पटकी करते रहे। बेचारा राजा, वह संघर्ष के दिनों के भाई और मुसीबत के दिनों के साथी को न छोड़ने की कसम उठाये बैठा था जबकि उसका उत्तराधिकारी दोनों ...