बंगालियों के लिए मुक्तिवाहिनी साबित हुए बिहारी
बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सत्ताधारी पार्टी नहीं रही। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी खुद चुनाव हार गईं। वैसे भी वैसाख-जेठ की प्रचंड धूप में न तृण बचता है न उसका मूल, सब झुलस जाते हैं। अस्तु
भोजपुरी संगीत में दुगोला गायकी की रात भर चलने वाली प्रतियोगिता की दशकों पुरानी रवायत है और इसका उद्गम स्थल माना जाता है तत्कालीन कलकत्ता को। असम के चाय बागानों के बाद बिहार का पलायन बंगाल में हुआ। हिंदुस्तान मोटर्स (एंबेसडर बनाने वाली कंपनी), जो भोजपुरी भाषियों में हिन्द मोटर के नाम से मशहूर है, समेत कई कंपनियों में बिहार के कुशल, अर्द्धकुशल और अकुशल श्रमिकों को रोज़गार मिला। परंपरावश ये मजदूर वहां समूह में रहते थे और बीवी बच्चे घर पर। इनमें किसी की स्थिति रोजाना धर्मतल्ला जाकर फ़ुचका (गोलगप्पा) खाने की तो थी नहीं, तो ये सभी लोग शाम में जुट कर भजन-कीर्तन करते थे। फिर यह कार्यक्रम रात तक चलने लगा। धुरान का तो धर्मतल्ला में फुचका पर चर्चित गाना भी है। गोपालगंज के बेचू मियां, बलिया के वीरेंद्र सिंह धुरान, देवरिया के गुलाब शर्मा, बक्सर के भरत शर्मा व्यास के अलावा परशुराम, पुलिस राय और तूफान समेत न जाने कितनों ने व्यास के रूप में कलकत्ते की धरती पर जन्म लिया। इस गीत संगीत के माध्यम से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग एकजुट हुए। बाद में यह एकजुटता चुनाव और छठ जैसे आयोजनों में दिखने लगी।
जब ममता बनर्जी की सरकार आई, तब ऐसे आयोजनों पर रोक लगने लगी। कोई सरकारी आदेश नहीं था, कभी पुलिस, कभी प्रशासन आयोजनों की इजाजत में अड़ंगा डालने लगे। ममता को यह लगा कि ये जुटेंगे नहीं तो शायद उनके खिलाफ लामबंदी मजबूत नहीं हो पाएगी। यह अघोषित पाबंदी उस कोलकाता में लगी जहां के मैदान में झालमूरी वालों के बगल में खड़े होकर और गा गाकर नागार्जुन जैसे कवि अपनी किताबें बेचते थे।
बिहारियों ने बंगाल की तरक्की में खून पसीना एक कर दिया, लेकिन उन्हें वहां हिंदुस्तानी कहा गया, लोकल लोग बंगाली थे। बिल्कुल जे एंड के की तरह। कश्मीरी और इंडियंस।
इस बीच 2024 में बांग्लादेश में बड़ा सत्ता संग्राम हुआ। भयानक मारकाट हुई। उस दौरान बांग्लादेशी हिंदुओं पर पाशविक अत्याचार हुए। यह सब देखकर पश्चिम बंगाल के भद्र समाज का माथा ठनका, कि जिन हिन्दुस्तानियों से वे नफरत करते हैं, वे तो उनके लिए खून पसीना एक कर रहे हैं। दूसरी तरफ बांग्ला अस्मिता के नाम पर वे जिनके साथ हैं वहां तो भविष्य घाटी वाले कश्मीरी पंडितों जैसा है। इस बीच संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटनाओं ने इसे बिल्कुल पुष्ट कर दिया।
अब भद्रलोक दीदी के खिलाफ हो चुका था, दूसरे प्रदेशों से गए लोग विरोध में थे ही, लेकिन सभी चुप। रोड पर आकार किसी ने नहीं कहा कि भाजपा बढ़िया है। बस लोग मन बना चुके थे और बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो गया था।
नीचे लिंक में व्यास पुलिस राय का इंटरव्यू है, जो चुनाव नतीजों के पहले से ऑनलाइन है।

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