गद्दी पा गए गौड़ा के कुमार
जेठ की गर्मी से झुलसी दूब की शिराओं में फिर से प्राण प्रवाह होने लगा है। परिंदे ट्वीट करने यानी चहचहाने लगे हैं, मोरों का फेस फेसबुक पर दिखने लगा है और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वे भी मारे खुशी के नाच रहे हैं। भाट और चारण विरुदावली गाने लगे हैं, वर्चुअल दुनिया में विचरण करनेवाले प्रगतिशीलों और धर्मनिरपेक्षों को एक्चुअल में आज़ादी का अहसास होने लगा है, एससी-एसटी मामले में दिए फैसले को लेकर कोर्ट से डगमगाई आस्था फिर से कायम हो गई है, अल्लाह की रहमतें बरसने लगी हैं। चुनाव पूर्व गठबंधन बनाकर लड़े दो दलों को सत्ता मिलने वाली है, दोनों को एक दूसरे की नीतियों में यकीन है और यह बात उनके रहनुमाओं ने चुनाव प्रचार के दौरान अपने वोटरों से कहा भी था। लोकतंत्र की हत्या तो हो ही गई थी, लेकिन अब डेमोक्रेसी की डुगडुगी फिर से बजनेवाली है। जो दो दल सत्ताधीश होने वाले हैं उनमें से किसी पर प्रजातंत्र को द्रोपदी की साड़ी बनाने का आरोप कहां है? इमरजेंसी लगाने और राज्यपालों पर दबाव बनाने का तो हरगिज़ नहीं। बापू बेटे दोनों की किस्मत एक ही कलम से लिखी गई है। दोनों का राजयोग अपने से बड़े दलों के सहयोग से था/है। फ्...