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ये रेत की इमारतें

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तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ  लुटा मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है। और जब सवाल उठते हैं तो हाकिम बुरा मानते हैं। मीडिया सवाल क्यों उठा रहा है? क्यों नहीं वो वह सब कुछ छापता है जो हम चाहते हैं। हमारे ऊपर जिले भर की जिम्मेदारी है। थोड़ी बहुत ऊंच नीच हो जाती है। इमारतें कहां नहीं गिरतीं, अवैध कॉलोनियां कहां नहीं बसती। नोयडा और गाज़ियाबाद को लेकर इतना हंगामा क्यों? मीडिया NDRF के उस अधिकारी का वर्जन क्यों लेता है जो बार बार यह कहता है कि मौके पर न तो हमें लेआउट प्लान मिलता है और न ही वहां मौजूद लोगों की संख्या लोकल प्रशासन बता पाता है। उसकी यह बात क्यों हाईलाइट की जाती है कि मौके पर पुलिस और तमाशबीनों में कोई अंतर नहीं होता। पुलिस लोगों को वहां से क्यों नहीं हटाती? जिल्ले इलाही, अधिसूचित एरिया में कोई भी मकान बना सकता है क्या? 6 मंजिल इमारत के पिलर 12 mm के सरिये पर टिकेंगे क्या? 12 फुट चौड़ी गली में 500 लोग सुरक्षित रहेंगे क्या? NDRF का काम मलबा हटाना है क्या? जिलों की डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी सिर्फ मौज काटने और मॉक ड्रिल के लिए बनी है क्या...

नोएडा में बीजेपी जीती तो महेश शर्मा हारेंगे

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दिल्ली से सटे गौतम बुद्ध नगर में यूपी विधान सभा की चुनावी बिसात पर सारे मोहरे सज चुके हैं। मोहरों के लिए बड़े खिलाड़ी चाल चल चुके हैं और अब इन प्यादों पर है कि कौन सारी बाधाएं पर कर वज़ीर बनता है और कौंन हाथी घोड़े की चाल में निपट जाता है। शतरंज से अलग इस खेल में खतरा यह भी है कि यहाँ पीछे खड़े अपने मोहरों से भी बचना होता है। पंकज सिंह के लिए प्लस पॉइंट यह होगा कि उन्हें बिना मेहनत के नवाब सिंह नागर और अशोक प्रधान का समर्थन मिलेगा तय कैंडिडेट्स के मुताबिक जो शुरुआती हालात हैं उससे लगता है कि नोएडा सीट पर बीजेपी जीतेगी और ऐसा हुआ तो पार्टी के जीतने पर भी बीजेपी के लोकल सांसद महेश शर्मा की हार होगी। जेवर सीट या तो बसपा जीत सकती है या ठाकुर धीरेंद्र सिंह। धीरेंद्र भले बीजेपी के कैंडिडेट हों लेकिन अगर उन्होंने सीट निकाली तो इसमें बीजेपी का बहुत रोल नहीं होगा। अभी लगता है कि धीरेंद्र की जीत महेश शर्मा की जीत होगी लेकिन यह राजनाथ सिंह की भी जीत हो सकती है। दादरी सीट बसपा के लिए सेफ है। यह इकलौती सीट है जहाँ बीजेपी जीती तो यह महेश शर्मा की जीत होगी। यहाँ जिन समीर भाटी पर कांग्रेस ने दांव...

जाति से पुलिसिंग???

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.......आपको जानकर हैरानी होगी कि अपने इलाकों के थानेदार तय करने में हम पहले वहां के जाति-समीकरण भी देखते हैं! इसलिए नहीं कि हम अनिवार्यतः जाति-प्रियता में श्रद्धा रखते हैं। इससे उस इलाके की पुलिसिंग आसान हो जाती है। कैसे हो जाती है, यह कभी उस इलाके के थानेदार से एक पत्रकार के तौर पर नहीं, आम आदमी बनकर पूछिएगा....... धर्मेंद्र सिंह, एसएसपी, नोएडा यह कहना है नोएडा के नए एसएसपी धर्मेंद्र सिंह का। उ न्होंने टीवी पत्रकार रवीश के पत्र के जवाब में जो लंबा जवाब लिखा है यह उसका एक अंश है। जाति के आधार पर थानेदार तय करने से इलाके की पुलिसिंग कैसे आसान हो जाती है, यह मेरी समझ से परे है। क्या थानेदार बहुसंख्यक जाति का होना चाहिए या सबसे कम आबादी वाली जाति का। मुझे लगता है कि एसएसपी बहुसंख्यक आबादी वाले शख्स को थानेदार तैनात कर उस इलाके की पुलिसिंग आसान बनाने की बातें कर रहे हैं। यदि एसएसपी यह सोच रहे हैं तो जाहिर है कि उनके ऊपर के अधिकारी भी जिले में या रेंज में अफसर तैनात करते वक्त जातिगत समीकरणों का ख्याल रखते होंगे। आपको लगता है कि यह बेहतर पुलिसिंग के लिए जरूरी है? ...