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सुनहुँ तात यह ‘अमर’ कहानी

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लड़कों को कितनी बार कहा बड़ो बूढ़ों से पंगा मत लो लेकिन वे तो यही साबित करना चाहते हैं कि बाप नम्बरी तो बेटा 10 नम्बरी। इसी उत्साह में चाचा से टकरा गए। अब चाचा ठहरे पुराने अखाड़ेबाज, जैसे ही यादवी गर्जना के साथ ताल ठोंकी, भतीजे के सारे दावं एक झटके में झंड हो गए। शायद मुगालता ये था कि, "पहले समय में ज्यों सुरों के मध्य में सजकर भले, थे तारकासुर मारने गिरी नंदिनी नंदन चले' (जयद्रथ वध) वैसे ही साइकिल सेना के वे ही एकमात्र सम्भावित सेनापति हैं। खुद को मोदी और चाचा को आडवाणी समझ लिए थे। लगता है भतीजा भूल गया था कि बैल बूढ़ा होने पर भी हल में चलना नहीं भूलता। थोड़ा और पीछे महाभारत की लड़ाई भूल गए। 18 दिन की लड़ाई में भीष्म, द्रोण और कृप का कितना बोलबाला था। अकेले भीष्म ही थे जो रोज 10 हज़ार रथियों का संहार कर रहे थे। युवा तुर्क चंद्रशेखर बुजुर्ग होने पर ही प्रधानमंत्री बन सके थे। ज्योति बाबू और हरिकिशन सिंह सुरजीत कैसे चौथेपन तक सरकार  और संगठन को अपने इशारे पर चला रहे थे। ताज़ा हाल महाभारत भी सत्ता के लिए हुआ पारिवारिक संघर्ष था और हाल में अवध में चल रही लड़ाई भी कमोबेश यही है...

जाति से पुलिसिंग???

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.......आपको जानकर हैरानी होगी कि अपने इलाकों के थानेदार तय करने में हम पहले वहां के जाति-समीकरण भी देखते हैं! इसलिए नहीं कि हम अनिवार्यतः जाति-प्रियता में श्रद्धा रखते हैं। इससे उस इलाके की पुलिसिंग आसान हो जाती है। कैसे हो जाती है, यह कभी उस इलाके के थानेदार से एक पत्रकार के तौर पर नहीं, आम आदमी बनकर पूछिएगा....... धर्मेंद्र सिंह, एसएसपी, नोएडा यह कहना है नोएडा के नए एसएसपी धर्मेंद्र सिंह का। उ न्होंने टीवी पत्रकार रवीश के पत्र के जवाब में जो लंबा जवाब लिखा है यह उसका एक अंश है। जाति के आधार पर थानेदार तय करने से इलाके की पुलिसिंग कैसे आसान हो जाती है, यह मेरी समझ से परे है। क्या थानेदार बहुसंख्यक जाति का होना चाहिए या सबसे कम आबादी वाली जाति का। मुझे लगता है कि एसएसपी बहुसंख्यक आबादी वाले शख्स को थानेदार तैनात कर उस इलाके की पुलिसिंग आसान बनाने की बातें कर रहे हैं। यदि एसएसपी यह सोच रहे हैं तो जाहिर है कि उनके ऊपर के अधिकारी भी जिले में या रेंज में अफसर तैनात करते वक्त जातिगत समीकरणों का ख्याल रखते होंगे। आपको लगता है कि यह बेहतर पुलिसिंग के लिए जरूरी है? ...