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गदहा की यारी में...

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सिंहासन बत्तीसी तक पहुंचने के लिए जिस तरह प्रेम पचीसी के बजाय गदहा पचीसी का सहारा लिया जा रहा है उससे इस भद्र जानवर को कितनी ख़ुशी हो रही होगी या दर्द हो रहा होगा ये फ़िलहाल पता नहीं। इस लौंडा पचीसी पर किसे दुलत्ती पड़ती है, यह तो 11 को पता चलेगा लेकिन फिलहाल तो गर्दभ पुराण का पाठ चालू है। किस गधे की वापसी? कृष्न चन्दर ने गधे पर 3 उपन्यास लिखे थे। 'एक गधे की आत्मकथा' 'एक गधे की वापसी' और 'एक गधा नेफा में'। अब यहाँ से कोई गधा नेफा में नहीं बल्कि नेपथ्य में जायेगा। किस गधे की वापसी होगी, फ़िलहाल तो इसका इंतजार ही ठीक रहेगा। एक लगातार दूसरी बार वापसी के लिये मचल रहा है तो दूसरा 14 साल का वनवास ख़त्म करने को व्याकुल है। गधा और घास गधा गर्मी में मोटा होता है और बारिश के दिनों में दुबला। यह विचित्र है। जब घास नहीं मिलती है तो गधा क्यों मोटा होता है। कहा जाता है कि गर्मी के दिनों में जब वह घास का एक-दो तिनका खाते हुए कई कोस तक चला जाता है और जब पीछे मुड़कर देखता है तो यह सोचकर तृप्त हो जाता है कि उसने इतने कोस की घास चर ली। मारे आत्मसंतुष्टि के उसकी खाल चिकनी ह...

अदब के इस अंजुमन को आदाब

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यह था स्वागत का अंदाज  जप-जाप जोगियों का, नारा कलंदरों का तहजीब महफिलों की और शोर मयकदों का माशूक बंदगी है, माशूक ही खुदा है मंदिर की घंटियों में बोले अदा का जादू सर चढ़ के बोलता है उर्दू जबां का जादू... वहां गायकी और शायरी की महफिल जमी थी, बहस-मुबाहिसों का दौर चल रहा था, मुक्ताकाश मंच और बंद सभागार थे और सर चढ़कर बोल रहा था उर्दू जबां का जादू।और यह सफर दिल्ली के केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तक लाने-ले जाने वाली फ्री शटल बस में ही शुरू हो जा रहा था। रेख्ता के इस जश्न में शामिल होने जा रहे  लोगों का इस्तकबाल बस में एक वॉलंटियर अदब और नफासत से पेश शेर से करता था और बमुश्किल पांच मिनट के सफर में प्रोग्राम के मिजाज का तआरुफ करा देता था। तहजीब की झलक भी 18 फरवरी को दिखी जब इस बस का एक शीशा टूटकर गिर गया। दिल्ली की मूल सभ्यता से हटकर इस वॉलंटियर ने चेहरे पर चिता का भाव लाकर पूछा था कि किसी को लगी तो नहीं? शाम में इस तरह जगमगा रही थी अदब की महफिल 17 फरवरी को प्रोग्राम के आगाज में भी यह जादू सर चढ़कर बोलता दिखा जब साज की...

बिसाहड़ा में भाजपा का जोर, पूरे दादरी इलाके में मुस्लिम वोट सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ

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बिसाहड़ा में आदर्श पोलिंग सेंटर बनाया गया था और शानदार टेंट, कारपेट, चेयर सभी का इंतजाम था। इसका बावजूद कहीं न कहीं तल्खी भी थी  जिसे लेकर  राणा  संग्राम   सिंह इंटर कॉलेज (यहां मतदान केंद्र था)  का  मेन गेट पूरी तरह नहीं खुला था। साइड का गेट ही लोगों के लिए खोला गया था, जिसमें से एक बार में एक ही आ दमी आ-जा सकता था।  यही मिले थे सुबोध राणा (दाएं)।  दूसरे पोलिंग सेंटरों पर पूरा गेट खुला था। टिकट बंटने से लेकर चुनाव प्रचार चलने तक जहां नोएडा सीट गौतमबुद्ध नगर में सबसे हॉट मानी जा रही थी, वहीं वोटिंग वाले दिन जिले की दादरी सीट पर राजनीतिक पारा सबसे चढ़ा रहा। शनिवार को यहां सीधे-सीधे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था। बिसाहड़ा कांड की वजह से प्रशासन भी इस इलाके में चौकस था। इस सीट के कई बूथों पर मतदाताओं से बात करने पर साफ पता चला कि मायावती के बजाय सपा-कांग्रेस गठबंधन पर मुसलमानों ने भरोसा किया है। दादरी की नई आबादी वाले बूथ पर गठबंधन के प्रत्याशी समीर भाटी का जोर दिखा। हालांकि यह भी कहा जा सकता है कि चूकि समीर वहीं रहते हैं इसल...

किस पर भारी, ये मुख्तारी?

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मुख़्तार अंसारी के कौमी एकता दल का मायावती की बसपा में विलय हो चुका है। मायावती ने 3 सीटें भी दे दी हैं। देखने में ये समझौता बहुत बड़ा नहीं लग रहा पर सभी प्रमुख दल इसे अपने फायदे के लिहाज से देख रहे हैं। बसपा मायावती को यह फायदा हो सकता है कि मऊ सदर सीट से मनोज राय का टिकट काटकर मुख़्तार को देने से बसपा का काडर वोट उसे पूरा मिलेगा। मनोज राय के बसपा का उम्मीदवार बनने के बाद जिस तरह से भूमिहार वोट मनोज के फेवर में जुट रहा था उससे sc वोटर चिंतित हो रहे थे।अब मुख़्तार के आने से उनके सामने कोई दुविधा नहीं है। चूँकि दलित-मुस्लिम संघर्ष का कोई उदाहरण नहीं मिलता। वैसे अंसारी भी मुसलमानों में पिछड़े होते हैं। बीजेपी ऐसा ही अनुमान बीजेपी के रणनीतिकार लगा रहे हैं। उनका मानना है कि मायावती ने भले ही upper cast को सबसे अधिक टिकट दिया हो, लेकिन मुख़्तार अंसारी के बसपा में शामिल होने के बाद उसका यह वोट बैंक मजबूती से बीजेपी के साथ खड़ा होगा। बीजेपी को एक फायदा और दिख रहा है कि ईस्ट यूपी की करीब 20 सीटों पर तो सीधे तौर पर मुस्लिम वोटों का बंटवारा सपा और बसपा में होगा। सपा मुस्लिम वोट...

नोएडा में बीजेपी जीती तो महेश शर्मा हारेंगे

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दिल्ली से सटे गौतम बुद्ध नगर में यूपी विधान सभा की चुनावी बिसात पर सारे मोहरे सज चुके हैं। मोहरों के लिए बड़े खिलाड़ी चाल चल चुके हैं और अब इन प्यादों पर है कि कौन सारी बाधाएं पर कर वज़ीर बनता है और कौंन हाथी घोड़े की चाल में निपट जाता है। शतरंज से अलग इस खेल में खतरा यह भी है कि यहाँ पीछे खड़े अपने मोहरों से भी बचना होता है। पंकज सिंह के लिए प्लस पॉइंट यह होगा कि उन्हें बिना मेहनत के नवाब सिंह नागर और अशोक प्रधान का समर्थन मिलेगा तय कैंडिडेट्स के मुताबिक जो शुरुआती हालात हैं उससे लगता है कि नोएडा सीट पर बीजेपी जीतेगी और ऐसा हुआ तो पार्टी के जीतने पर भी बीजेपी के लोकल सांसद महेश शर्मा की हार होगी। जेवर सीट या तो बसपा जीत सकती है या ठाकुर धीरेंद्र सिंह। धीरेंद्र भले बीजेपी के कैंडिडेट हों लेकिन अगर उन्होंने सीट निकाली तो इसमें बीजेपी का बहुत रोल नहीं होगा। अभी लगता है कि धीरेंद्र की जीत महेश शर्मा की जीत होगी लेकिन यह राजनाथ सिंह की भी जीत हो सकती है। दादरी सीट बसपा के लिए सेफ है। यह इकलौती सीट है जहाँ बीजेपी जीती तो यह महेश शर्मा की जीत होगी। यहाँ जिन समीर भाटी पर कांग्रेस ने दांव...

सिर्फ तुकबंदी नहीं हैं छठ के गीत

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छठ, लोक आस्था का महापर्व। जाहिर है इस पर्व पर लोक कंठों से फूटने वाले गीत सिर्फ तुकबंदी तो होंगे नहीं। पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जा रहे छठ के सारगर्भित गीतों का यदि हम मतलब और मकसद समझ लें, तो समझिए छठ माता की पूजा करने जितना पुण्य मिल गया। यह बात प्रचलित है कि छठ बेटों का त्योहार है। पुत्र प्राप्ति की इच्छा के साथ और पुत्र प्राप्ति के बाद कृतज्ञता जताने के लिए यह व्रत किया जाता है। लेकिन, छठ के गीत इससे पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखते। कई गानों में बेटियों की कामना की गई है। ऐसा ही एक गीत है - पांच पुत्तर, अन्न-धन लक्ष्मी, धियवा (बेटी) मंगबो जरूर । यानी बेटे और धन-धान्य की कामना तो की गई है, लेकिन उसमें यह बात भी है कि छठ माता से बेटी जरूर मांगना है। यह 'जरूर' शब्द साबित करता है कि बेटियों को लेकर छठ पूजा करने वाले समाज ने बेटों और बेटियों में फर्क नहीं किया। एक और गीत यूं है कि रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला पढ़ल पंडितवा दामाद, हे छठी मइया...। संभवत: ये गीत स्त्री कंठों से फूटे थे और आज भी छठ के मौके पर आमतौर पर महिलाएं ही इन गीतों को गाती हैं, जबकि व्रतियों में पुरुष भी होते हैं। दाद दीजि...

वर्ण व्यवस्था को खामोश चैलेंज

बादशाह अकबर ने एक बार बीरबल से कहा कि जमीन पर खिंची लकीर को बिना काटे या मिटाये छोटा करके दिखाओ। बीरबल ने तत्काल उस लकीर के समानान्तर उससे बड़ी लकीर खींच दी और कहा कि देखिये आपकी लकीर छोटी हो गई। यानी बादशाह को उसी की चाल से मात। वर्ण व्यवस्था के संस्थापकों ने कहा कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण,भुजा से ठाकुर, जांघ से वैश्य और पैरों की उँगलियों से शूद्रों का जन्म हुआ।अधिकतर लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन एक जाति के नुमाइंदों ने बीरबल की तरह इससे बड़ी लकीर खींच दी कि उनके आदि पुरुष का जन्म ब्रह्मा के पूरे शरीर से हुआ है और ब्रह्मा की पूरी काया में स्थित होने के कारण उनकी जाति कायस्थ है। और यह वर्ण व्यवस्था को पहला चैलेंज था। वर्ण व्यवस्था में चारों वर्णों के लिए चार त्यौहार भी नियत थे। ब्राह्मणों का रच्छा बंधन, ठाकुरों का दसहरा, वैश्यों की दिवाली और शूद्रों के लिए होली। दूसरी लकीर यह खींची गई और कहा गया कि कायस्थों का पर्व चित्रगुप्त पूजा है। चारों त्योहारों से इतर। यह सिस्टम को दूसरा चैलेंज था। जाति वर्ण में समाज को बाँटने वालों ने गोत्र की भी कल्पना की। कहा जाता है कि एक ...