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देव स्वतंत्र नहीं रहेंगे या मऊ में अरविंद (कमल) खिलाने की रणनीति

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अरविंद कुमार शर्मा या एके शर्मा। यह नाम थोड़ी देर पहले चर्चा में आया है। यूपी का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद। चर्चा की एक वजह यह भी है कि आईएएस अधिकारी रह चुके शर्मा को जिनके पास न संगठन चलाने का अनुभव है न जनाधार, उन्हें उस राज्य में संगठन में इतना जिम्मेदार ओहदा क्यों दे दिया गया, जहां अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ दिनों से इनका नाम डिप्टी सीएम के लिए आगे किया जा रहा था, जिस पर अब विराम लग गया है। वैसे अरविंद शर्मा की राजनीति में एंट्री भी चौंकाने वाली थी। बीजेपी में शामिल होते ही एमएलसी कैंडिडेट घोषित कर दिए गए थे। गुजरात कैडर के इस पूर्व नौकरशाह को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी माना जाता है। आज के बदलाव के कुछ कयास हैं। या तो विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण के दौरान प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र नहीं रहेंगे। टिकट वितरण में केंद्रीय नेतृत्व को जिस नाम पर ऑब्जेक्शन लगवाना होगा, वह अरविंद शर्मा के माध्यम से लगवाया जाएगा।  या यह कि अरविंद शर्मा को मऊ सदर से विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया जाए, जहां से मुख्तार अंसारी 2017 में बसपा के टिकट पर ...

नाम में क्या रखा है? कन्फ्यूजन

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यह पुराना सवाल है कि नाम में क्या रखा है? सवाल यह भी है कि सरनेम में क्या रखा है? जाहिर है या तो पहचान क्लियर या कन्फ्यूजन। दो दिन पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए जितिन प्रसाद के मामले में भी यही हुआ। जितिन की कहानी यही छोड़कर हम चलते हैं यूपी के शो विंडो नोएडा में और वहां इसका एक और तमाशा देखते हैं। 2014 में लोकसभा का चुनाव हुआ था। 2012 में नोएडा विधानसभा सीट से विजयी डॉ. महेश शर्मा के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह सीट खाली हुई थी। यहां हुए उपचुनाव में बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया था विमला बाथम को जबकि उनकी ्प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थीं सपा की काजल शर्मा। काजल शर्मा जैसा कि सरनेम से पता चलता है, ब्राह्मण हैं। विमला बाथम को लेकर उनके विरोधियों ने खबर फैला दी कि वह ईसाई हैं। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान विमला बाथम को यह बात लगातार कहनी पड़ी कि वह वैश्य हैं। बाथम सरनेम से किसी और जाति-धर्म का मतलब नहीं। जितिन प्रसाद के बीजेपी जॉइन करते ही यह खबर तेजी से फैली या फैलाई गई कि वह प्रदेश में बड़े ब्राह्मण चेहरा हैं और इसलिए बीजेपी उन्हें अपने पाले में लेकर आई है। अब इनके सरनेम से तो ब्राह्म...

इमेज बनाने की कोशिश में गोइठा पाथ दिया 'महारानी' ने

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कुछ सच्चे पात्रों के साथ फर्जी कहानी। 2020 में जंगलराज की वजह से बिहार विधानसभा का चुनाव हारने के बाद अगले चुनाव से पहले उस पर पर्दा डालने की कोशिश। चारा घोटाला को दाना घोटाला कह कर नाम को लेकर कन्फ्यूज करने का प्रयास और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ही नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह सहूलियत के मुताबिक दिखाने की कला का प्रदर्शन। कहानी भी सच्ची घटना से मिलती-जुलती रखिए, जगह का नाम भी जो हकीकत में है उसे रखिए और यह भी कह दीजिए कि यह सब काल्पनिक है। इसलिए कोई अगर किसी सच्ची घटना पर आधारित या उसके आसपास की मूवी या वेब सीरीज बनाता है, तो वह कितनी छूट ले सकता है, इसकी सीमा रेखा तय करने का भी वक्त आ गया है। इस वेब सीरीज के बाद बिहार के रास्ते सिर्फ ट्रेन या प्लेन से गुजरने वाले भी एक बार फिर बिहार के बारे में लिखने-बोलने लगेंगे। एक बार फिर मायावती और ममता के बराबर का कद राबड़ी देवी का बताने वाले समीक्षकों की बाढ़ आ जाएगी। कुल मिलाकर यह वेब सीरीज राजनीतिक मकसद हासिल करने के इरादे से बनाई गई है, लेकिन इसे रियल स्टोरी बताने से भी गुरेज किया गया है। फैक्ट से छेड़छाड़ लालू यादव ने जब बिहार का सीएम और वित्त मंत्री ...

कोरोना : सामूहिक क्रीमैशन क्यों नहीं?

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कोरोना काल में जिस तरह लोगों की मौत हो रही है, उनसे श्मशान-कब्रिस्तान में लाशों की कतार दिख रही है। सवाल यह है कि क्या सामूहिक दाह संस्कार या सामूहिक सुपुर्दे खाक की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती? बक्सर में 1764 में जो इतिहास प्रसिद्ध लड़ाई हुई थी, उस युद्ध के मैदान के बगल में एक कब्रगाह भी है। उसमें उस युद्ध में मारे गए सभी मुसलमान सैनिक दफन हैं। कहा जाता है कि इस्लाम में ऐसा प्रावधान है कि युद्ध में मारे गए सैनिकों की सामूहिक कब्र बनती है। आज इमरजेंसी के हालात हैं, क्या आज ऐसा इंतजाम नहीं हो सकता? केदारनाथ में 2013 में जो आपदा आई थी, उसमें भी शवों का सामूहिक दाह संस्कार किया गया था। महाभारत काल में कहा जाता है कि भीम ने जब किंचक का वध किया तो उसके बाकी बचे 99 भाई भीम को सबक सिखाने वहां आ गए थे। भीम ने श्मशान घाट में इन सभी को मार डाला था, और सामूहिक चिता पर सभी को जला दिया था। तो क्या अब के हालात में सामूहिक चिताएं नहीं बन सकतीं? दफनाने के लिए जगह कम पड़ती जा रही हैं, जलाने के लिए लकड़ियां नहीं मिल रही हैं, विद्युत शवदाह गृह जरूरत के मुताबिक हैं नहीं, तो समाधान तो यही हो सकता है कि साम...

कोरोना : बेड का संकट और सेना के फील्ड हॉस्पिटल

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कोरोना के द्विरागमन में सामान्य बेड, ऑक्सिजन बेड, ऑक्सिजन और ऑक्सिजन सिलेंडर की कमी की खबरें लगातार आ रही हैं। क्या सिर्फ यह कहकर बैठा जा सकता है कि इस इंफ्रास्ट्रक्चर में कितना करें? क्या वक़्त नहीं आ गया है कि इसमें सेना की मदद ली जाए? इंडियन आर्मी की बात करें तो इसके तकरीबन 40 डिविजन हैं। एक डिविजन में दो फील्ड हॉस्पिटल होते हैं। इस लिहाज से कुल फील्ड हॉस्पिटल हुए कम से कम 80 और इनमें से अधिकतर सालों भर इनएक्टिव रहते हैं। कुछ जरूर इस समय भी सीमावर्ती इलाकों में चल रहे होंगे, लेकिन इनका मुख्य इस्तेमाल युद्ध काल में ही होता है। अगर एक डिविजन से एक फील्ड हॉस्पिटल भी सिविल ड्यूटी में लगा दिया जाए तो हालात पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। इन फील्ड हॉस्पिटल में सिर्फ बेड ही नहीं, बल्कि ड्रेसिंग रूम, पोर्टेबल ओक्सिजन सिलेंडर और ऑपेरशन थिएटर तक होते हैं। अभी ओटी की जरूरत तो है नहीं, सिर्फ सामान्य बेड और ऑक्सिजन बेड वाले फील्ड हॉस्पिटल सेना तुरंत तैयार भी कर देगी। अब उसमें सेना का भी मेडिकल स्टाफ रहे और जरूरत के मुताबिक सिविल मेडिकल स्टाफ भी सपोर्ट करे। विवाद ऑक्सिजन का दिल्ली और हरियाणा स...

टिकैत के राजस्थान दौरे से किसे राहत?

यूपी-दिल्ली सीमा पर चल रहा  आंदोलन किसान आंदोलन है या जाट आंदोलन, यह मसला कई बार उठ चुका है। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बन गए हैं। कुछ दिनों तक हरियाणा में घूम-घूमकर पंचायत करने के बाद इन दिनों वह राजस्थान के दौरे पर हैं। हरियाणा में जिन इलाकों में उनकी सक्रियता रही और अब राजस्थान के चुरू से लेकर सीकर तक वह पहुंचे, उससे सीधा दिख रहा है कि वह सिर्फ स्वजातीय यानी जाटों के प्रभाव वाले इलाकों में जा रहे हैं। वहां वह भले केंद्र सरकार और भाजपा पर बरसते दिख रहे हों, लेकिन जो वे कर रहे हैं, उससे  राहत में भाजपा ही  रहेगी। राजस्थान का सचिन पायलट प्रकरण याद करिये। उस विवाद के तुरंत बाद राज्य की राजनीति में हाशिये पर चले गए जाट नेताओं को लुभाने की कोशिश  हुई। कांग्रेस ने गोविंद सिंह डोटेसरा (जाट) को प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो बीजेपी ने सतीश पूनिया (जाट) को। बीजेपी की जाट प्रदेश अध्यक्ष बनाने की एक मंशा वसुंधरा राजे पर भी कंट्रोल रखना था जो पैदा तो राजपूत परिवार में हुई हैं लेकिन राजस्थान में जाट परिवार में शादी होने के बाद उनकी रा...

ऐसे टिके हैं टिकैत !

  किसान आंदोलन का एकमात्र चेहरा बन चुके राकेश टिकैत ने कहा है कि वे बंगाल में भी जाकर किसान पंचायत करेंगे। इसके पहले उन्होंने 2024 तक आंदोलन करने की बात कही।  बंगाल में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और 2024 में आम चुनाव होगा। इन दोनों बयानों से साफ लग रहा है कि टिकैत किसी खास एजेंडे पर काम कर रहे हैं और केंद्र सरकार और बीजेपी के खिलाफ हैं। लेकिन इसके साथ ही टिकैत हरियाणा के जाट प्रभाव वाले इलाकों जींद, कुरुक्षेत्र, सिरसा में भी सक्रिय हो रहे हैं, जहां जाट वोट पर आधारित जजपा और इनेलो का जनाधार है। जजपा हरियाणा में बीजेपी के साथ सरकार चला रही है लेकिन रिश्ते बहुत भरोसेमंद नहीं हैं। जजपा ने नौकरियों में स्थानीय युवाओं के लिए रिजर्वेशन लागू करवा लिया है। बीजेपी के बाहर से आकर बसे वोटर इसे लेकर सहज नहीं हैं। जब से टिकैत की हरियाणा में सक्रियता बढ़ी है तो जाहिर है कि इनेलो और जजपा के नेता परेशान होंगे। अब जजपा के सामने नई चुनौती टिकैत का काट खोजने की होगी और जब तक वह इस काम में लगी रहेगी, वह बीजेपी पर प्रेशर नहीं बना पाएगी। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कई जाट दिग्गज चुनाव हार गए थे। जजपा...