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हवाई अड्डे पर किसानों पर फोकस रहे योगी

अब से थोड़ी देर पहले नोएडा इंटरनैशनल एयरपोर्ट के शिलान्यास के मौके पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पूरे चुनावी तेवर में दिखे। अपने संबोधन में उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों से गन्ने की मिठास जोड़ी वहीं, यह भी कहा कि कुछ लोगों ने गन्ने की मिठास कड़वाहट में बदल करके दंगों की श्रृंखला खड़ी की। उन्होने सवालिया लहजे में कहा कि देश गन्ने की मिठास को नई उड़ान देगा या जिन्ना के अनुयायियों से दंगा करवाने की शरारत करवाएगा? हाल ही में तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा के बाद हुए इस आयोजन में योगी ने अपने संबोधन में किसानों को साधने की कोशिश की। उन्होंने नोएडा एयरपोर्ट के लिए जमीन देने वाले उन सात हजार किसानों का खास तौर पर शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने लखनऊ जाकर बिना किसी विवाद के जमीन उपलब्ध करवाई। ...

किधर हो कॉमरेड?

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राजनीतिक क्षेत्र की पुरानी कहावत है कि किशोरावस्था और युवावस्था की संधि बेला में आप कम्युनिस्ट नहीं हुए तो आपके पास दिल नहीं है और कुछ समय बाद आपने कम्युनिज्म छोड़ा नहीं तो आपके पास दिमाग नहीं है। यह थ्योरी कितनी सही है, पता नहीं, लेकिन लगातार कम्युनिस्ट विचारधारा और उसमें से भी छात्र नेताओं का विपरीत विचारधारा वाले दलों में जाना तो इसे सही ही साबित करता है। दिमाग परिपक्व होते ही वे नए दल में चले जा रहे हैं। जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार कांग्रेस में चले गए हैं। वह एआईएसएफ से जुड़े थे जो सीपीआई की स्टूडेंट विंग है। 2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीआई ने उन्हें बेगूसराय से कैंडिडेट बनाया था लेकिन वह बीजेपी के गिरिराज सिंह से हार गए थे। कन्हैया कुमार के समर्थन में देश भर से कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लोगों का मजमा बेगूसराय में लगा रहा था, जिसे कई लोग लेनिनग्राद बताते हैं। एक सवाल यह उठता है कि क्या सीपीआई कांग्रेस के करीब है? इमरजेंसी के दिनों की बात करें तो सीपीआई यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़ी थी। इमरजेंसी के विरोध में होने वाली सभाओं को ...

चर्चा में भाला

टोक्यो ओलंपिक में जेवलिन थ्रो में भारत के नीरज चोपड़ा को स्वर्ण पदक मिलने के बाद भाला पहली बार चर्चा में है। महाभारत काल में पांडु पुत्र युधिष्ठिर का यह प्रिय हथियार था और कहा जाता है कि वह भाला युद्ध में प्रवीण थे। हालांकि उससे पहले रामायण काल में भाले का जिक्र नहीं आता। टीवी धारावाहिकों में रावण के सैनिक जरूर भाले के साथ दिखते हैं, लेकिन वह आधुनिक ब्याहघरों से प्रभावित लगता है जहां दो लोग राजतंत्र के जमाने की वेशभूषा में भाला लेकर खड़े रहते हैं।   श्याम नारायण पांडेय ने काव्य ‘हल्दी घाटी’ में निर्जीव हथियारों में भी प्राण प्रतिष्ठा कर दी थी। कई जगह उन्होंने भाले का जिक्र किया है। प्रथम सर्ग में ही जब महाराणा प्रताप अपने भाई शक्ति सिंह के साथ शिकार के लिए चले तो श्याम नारायण पांडेय लिखते हैं -  राणा भी आखेट खेलने, शक्त सिंह के साथ चला  पीछे चारण, वंश पुरोहित, भाला उसके साथ चला और उसी आखेट क्षेत्र में जब दोनों किसी कारणवश आमने-सामने तन गए तो कवि ने लिखा -  क्षण-क्षण लगे पैंतरा देने, बिगड़ गया रुख भालों का  रक्षक कौन बनेगा अब इन, दोनों रण मतवालों का कई जगह ज...

ब्राह्मण शंख बजाएगा, पर हाथी किधर जाएगा?

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अयोध्या सम्मेलन की तस्वीरें। फोटो : खेमराज वर्मा 23 जुलाई यानी शुक्रवार को अयोध्या में बसपा का एक सम्मेलन हुआ, जिसे पहले ब्राह्मण सम्मेलन नाम दिया गया था, फिर ऐन वक्त पर उसे ‘प्रबुद्ध वर्ग विचार गोष्ठी’ नाम दे दिया गया। इस सम्मेलन में परंपरागत नारों के अलावा जय श्रीराम और जय परशुराम के भी नारे लगे। बीबीसी की रिपोर्ट है कि नारे तो परशुराम के नाम के जरूर लगे, लेकिन मंच पर उनकी कोई फोटो नहीं थी। इस बारे में पूछे जाने पर सम्मेलन में मौजूद लोगों ने बताया कि मंच पर फोटो तो उसी की लगेगी, जिसने समाज के लिए कुछ किया हो। राम और परशुराम के जयघोष के बीच जब बीबीसी ने सतीश चंद्र मिश्रा को बसपा के पुराने विवादास्पद नारों की याद दिलाई तो  उन्होंने कहा कि ये नारे न तो किसी बसपा नेता ने कभी लगाए और न ही ऐसै  नारे कभी मंच से लगाए गए। सतीश चंद्र मिश्रा ने वहां तमाम धार्मिक कर्मकांड किए और उन्हें गिनाया भी। वैसे यह भी हैरान करने वाली बात है कि जब सतीश चंद्र मिश्रा यह बता रहे थे कि प्रदेश में 13 फीसदी ब्राह्मण और 23 फीसदी दलितों के पास ही सत्ता की चाबी है, उसके अगले दिन शनिवार को राजद नेता तेजस्वी ...

गुरु : बंधु भी बनो और सखा तुम्हीं

आज गुरु पूर्णमा पर तमाम लोग गुरुओं के प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। इसे ऋषि ऋण भी मान सकते हैं। तीन ऋण लेकर मनुष्य जनमता है-देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पूजा-पाठ और हवन यज्ञ से मनुष्य देव ऋण से उऋण होता है और संतान उत्पति करने से पितृ ऋण से। विद्या अर्जन और उसका प्रसार करने से मनुष्य ऋषि ऋण से मुक्त हो जाता है। ऋषियों को गुरु की श्रेणी में रखा जा सकता है।  गुरु वह है जो हमारा धर्म परिवर्तन कराए। धर्म परिवर्तन यानी विचारों में परिवर्तन। किसी एक धर्म से दूसरे धर्म में गमन की क्रिया नहीं। एक धर्म से दूसरे धर्म में गमन की क्रिया धर्मांतरण कही जाती है।  विचारों में परिवर्तन करवाने वाले को गुरु माना जाए तो रामचंद्र सुग्रीव के गुरु हुए। सुग्रीव तो अपने बड़े भाई बालि के भय से हनुमान और जामवंत आदि सचिवों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर छिप कर रह रहे थे। राम उनके विचारों में परिवर्तन लाए और इसके बाद ही सुग्रीव अपने भाई बालि के साथ युद्ध को तैयार हुए। हालांकि इसकी एक वजह यह भी थी कि राम ने उन्हें भरोसा दिया था कि बालि से संग्राम के दौरान वह उनकी मदद करेंगे, यह आश्वासन भी सुग्रीव के विचार...

जिल्ले इलाही

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सत्ता केंद्र की कमजोरी होती है, वह अपने सामने किसी को पनपने नहीं देना चाहता, भले वह कितना भी बेहतर परफ़ॉर्मर हो। इस कवायद में भले सत्ता नष्ट हो जाए, यह मंजूर होता है। यदि किसी ने केंद्रीय नेतृत्व का बिना आशीर्वाद लिए किसी मौके पर या लगातार बढ़िया उपलब्धि हासिल कर ली, तो नेतृत्व इस ताक में लग जाता है कि कब और कैसे उसे फंसाया जाए? निपट तो वह खुद ही जायेगा। पंजाब विधानसभा के पिछले चुनाव में कांग्रेस जीती और उसकी सरकार बनी। लेकिन परफॉर्म तो कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बेहतर किया था, बिना केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे, लिहाजा जीत का श्रेय न सोनिया गांधी एंड फैमिली को मिला, न मिलना चाहिए था। लोग पांच साल तक कैप्टन की जीत की ही बात करते रहे।  अब फिर चुनाव का वक्त आ गया है। केंद्रीय नेतृत्व वहां पार्टी का प्रदर्शन कमज़ोर करने को तैयार है, लेकिन कैप्टन को फ्री हैंड देने को राजी नहीं। उसने नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, जो पहले भाजपा में थे और कुछ दिनों से आम आदमी पार्टी का गुणगान कर रहे थे। राजनेता के रूप में सिद्धू का कद क्या कैप्टन जितना बड़ा है, इसका जवाब कांग्रेस को पारिवारिक पार्टी ब...

देव स्वतंत्र नहीं रहेंगे या मऊ में अरविंद (कमल) खिलाने की रणनीति

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अरविंद कुमार शर्मा या एके शर्मा। यह नाम थोड़ी देर पहले चर्चा में आया है। यूपी का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद। चर्चा की एक वजह यह भी है कि आईएएस अधिकारी रह चुके शर्मा को जिनके पास न संगठन चलाने का अनुभव है न जनाधार, उन्हें उस राज्य में संगठन में इतना जिम्मेदार ओहदा क्यों दे दिया गया, जहां अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ दिनों से इनका नाम डिप्टी सीएम के लिए आगे किया जा रहा था, जिस पर अब विराम लग गया है। वैसे अरविंद शर्मा की राजनीति में एंट्री भी चौंकाने वाली थी। बीजेपी में शामिल होते ही एमएलसी कैंडिडेट घोषित कर दिए गए थे। गुजरात कैडर के इस पूर्व नौकरशाह को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी माना जाता है। आज के बदलाव के कुछ कयास हैं। या तो विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण के दौरान प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र नहीं रहेंगे। टिकट वितरण में केंद्रीय नेतृत्व को जिस नाम पर ऑब्जेक्शन लगवाना होगा, वह अरविंद शर्मा के माध्यम से लगवाया जाएगा।  या यह कि अरविंद शर्मा को मऊ सदर से विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया जाए, जहां से मुख्तार अंसारी 2017 में बसपा के टिकट पर ...