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टिकैत के राजस्थान दौरे से किसे राहत?

यूपी-दिल्ली सीमा पर चल रहा  आंदोलन किसान आंदोलन है या जाट आंदोलन, यह मसला कई बार उठ चुका है। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बन गए हैं। कुछ दिनों तक हरियाणा में घूम-घूमकर पंचायत करने के बाद इन दिनों वह राजस्थान के दौरे पर हैं। हरियाणा में जिन इलाकों में उनकी सक्रियता रही और अब राजस्थान के चुरू से लेकर सीकर तक वह पहुंचे, उससे सीधा दिख रहा है कि वह सिर्फ स्वजातीय यानी जाटों के प्रभाव वाले इलाकों में जा रहे हैं। वहां वह भले केंद्र सरकार और भाजपा पर बरसते दिख रहे हों, लेकिन जो वे कर रहे हैं, उससे  राहत में भाजपा ही  रहेगी। राजस्थान का सचिन पायलट प्रकरण याद करिये। उस विवाद के तुरंत बाद राज्य की राजनीति में हाशिये पर चले गए जाट नेताओं को लुभाने की कोशिश  हुई। कांग्रेस ने गोविंद सिंह डोटेसरा (जाट) को प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो बीजेपी ने सतीश पूनिया (जाट) को। बीजेपी की जाट प्रदेश अध्यक्ष बनाने की एक मंशा वसुंधरा राजे पर भी कंट्रोल रखना था जो पैदा तो राजपूत परिवार में हुई हैं लेकिन राजस्थान में जाट परिवार में शादी होने के बाद उनकी रा...

ऐसे टिके हैं टिकैत !

  किसान आंदोलन का एकमात्र चेहरा बन चुके राकेश टिकैत ने कहा है कि वे बंगाल में भी जाकर किसान पंचायत करेंगे। इसके पहले उन्होंने 2024 तक आंदोलन करने की बात कही।  बंगाल में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और 2024 में आम चुनाव होगा। इन दोनों बयानों से साफ लग रहा है कि टिकैत किसी खास एजेंडे पर काम कर रहे हैं और केंद्र सरकार और बीजेपी के खिलाफ हैं। लेकिन इसके साथ ही टिकैत हरियाणा के जाट प्रभाव वाले इलाकों जींद, कुरुक्षेत्र, सिरसा में भी सक्रिय हो रहे हैं, जहां जाट वोट पर आधारित जजपा और इनेलो का जनाधार है। जजपा हरियाणा में बीजेपी के साथ सरकार चला रही है लेकिन रिश्ते बहुत भरोसेमंद नहीं हैं। जजपा ने नौकरियों में स्थानीय युवाओं के लिए रिजर्वेशन लागू करवा लिया है। बीजेपी के बाहर से आकर बसे वोटर इसे लेकर सहज नहीं हैं। जब से टिकैत की हरियाणा में सक्रियता बढ़ी है तो जाहिर है कि इनेलो और जजपा के नेता परेशान होंगे। अब जजपा के सामने नई चुनौती टिकैत का काट खोजने की होगी और जब तक वह इस काम में लगी रहेगी, वह बीजेपी पर प्रेशर नहीं बना पाएगी। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कई जाट दिग्गज चुनाव हार गए थे। जजपा...

किसान उगाना जानते हैं, बेचना सीख लें

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किसान स्थायी दुकान न खोलना चाहें तो मूविंग शॉप भी खोल सकते हैं। आखिर गुड़, आम वे घोड़ागाड़ियों या बैलगाड़ियों पर बेचते ही हैं। सरकार का मुंह देखने के बजाय खुद समाधान सोंचे। बाकी प्रदर्शन करने के लिए हर कोई स्वतंत्र है। कई बार मन में यह सवाल उठता है कि पंजाब समेत जिन इलाको के किसानों ने हरित क्रांति की मलाई खाई, वही बार-बार क्यों आंदोलित होते हैं? हमेशा वही प्रदर्शन करने क्यों दिल्ली आते हैं? हरियाणा और वेस्टर्न यूपी के जाट किसानों की ही अधिकतर भागीदारी इसमें क्यों होती है? अगर ये किसानों के प्रतिनिधि हैं तो बिहार-झारखंड के किसानों को क्यों नहीं बुलाते? क्या उनके पास दिल्ली आने-जाने लायक भी पैसा नहीं है क्योंकि उनमें अधिकतर सीमांत किसान हैं। ईस्टर्न यूपी के किसानों की भागीदारी क्यों नहीं दिखती?  एक सवाल उठता रहता है मन में। किसान खुद को सिर्फ उत्पादन तक क्यों सीमित रखता है? वह भंडारण क्यों नहीं सीखता? वह उत्पादन को बेचने की कला क्यों नहीं डेवलप करता? फिर उसे एमएसपी के पचड़े में पड़ना ही नहीं पड़ेगा। आखिर किसान अपने जानवरों के लिए भूसे  और अपने खाने लायक साल भर के अनाज का...

एक था माराडोना, जो हमेशा जिंदा रहेगा

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फोटो : गूगल से 1983 में क्रिकेट का प्रूडेंशियल वल्र्ड कप जीतने के बाद भारत में  क्रिकेट और भी लोकप्रिय हो रहा था। बालक-युवा सभी इसके दीवाने  थे। शहरों से भी अधिक कस्बाई और ग्रामीण भारत में। उसी समय  1986 में फुटबॉल का विश्व कप मेक्सिको में हुआ। महीने भर का कुंभ। और इस कुंभ से निकले थे डियेगो माराडोना, जिनकी लोकप्रियता का डंका उनके देश से निकलकर भारत समेत पूरी दुनिया में बजने लगा  था। लोग क्रिकेट के साथ फिर से फुटबॉल को तरजीह देने लगे थे। उनकी 10 नंबर की जर्सी ही नहीं बाएं कान की बाली भी हिट हो चुकी थी। 1983 में कपिल देव बनने का सपना देखने वालीं कई आंखें माराडोना बनने का ख्वाब सजाने लगी थीं। छोटे कद के इस  गठीले और फुर्तीले खिलाड़ी ने यह दिखा दिया था कि किस तरह मिड फील्ड से गेंद लेकर न सिर्फ गोलपोस्ट तक पहुंचा जा सकता है, बल्कि गोल भी मारा जा सकता है।  भारत के लोग माराडोना से एक बच्चे की तरह प्यार करते थे। एक ऐसा बच्चा जो बिगड़ा हुआ भी है लेकिन वक्त पर काम आता है। पेले की  लोग इज्जत करते थे, पर माराडोना से प्...

क्या कमज़ोर प्रदर्शन सिर्फ कांग्रेस का है?

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जिस समय बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे फाइनल राउंड की ओर बढ़ रहे थे, उस समय एक जोक वायरल होने लगा था।  जोक यह था- तेजस्वी-भाई हम तो चुनाव हार रहे हैं राहुल-भाई, तू अपनी देख ले, हम तो हर महीने कहीं न कहीं हारते रहते हैं। नतीजे आये और राजद ने हार का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ दिया। यह कहा गया कि कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन से नहागठबन्धन की यह हालत हुई है। बाद में राजद के शिवानन्द तिवारी ने यहां तक कह दिया कि जब चुनाव हो रहा था तब राहुल गांधी प्रियंका गांधी के घर पर पिकनिक मन रहे थे। हालांकि बाद में राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने इसे तिवारी का व्यक्तिगत बयान बताया था और कहा था कि इसे पार्टी का बयान न माना जाए। सवाल यह है कि कमज़ोर प्रदर्शन सिर्फ कांग्रेस का है? क्या राजद ने पिछले चुनाव से बेहतर परफॉर्म किया है? तेजस्वी यादव ने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया है? 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने 80 सीटें जीती थी, जब वह 100 या 101 सीटों पर लड़ा था। इस चुनाव में वह 144 सीटों पर लड़ा और 75 सीटें ही जीत पाया। कांग्रेस 2015 में 41 में से 27 सीटें जीत सकी थी जबकि इस बार 70 में 19 पर ही जीत पाई।...

चमकी : लीची बदनाम, मंगल को इनाम

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मंगल पांडेय बिहार में एक बार फिर चुनी हुई सरकार ने शपथ ले ली, लेकिन राज्य के सेहत मंत्री रहे मंगल पांडेय को मंत्री बनाना चौंकाने वाला है। सरकार चाहे जो कहे, बिहार में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्टर कमज़ोर है, यह मानने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है। 2017 में जब बक्सर में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे का बक्सर में पैर टूट गया था, तब सदर अस्पताल में एक्सरे करनेवाली मशीन काम नहीं कर रही थी। उन्हें प्राइवेट डायग्नोस्टिक सेंटर पर ले जाया गया, फिर इस मामूली इलाज के लिए पहले पटना और फिर दिल्ली चले गए। मुजफ्फरपुर का जानलेवा चमकी बुखार सबको याद ही है। स्वास्थ्य विभाग की कमी का ठीकरा लीची के सिर फोड़ दिया गया। मंगल पांडेय चुनाव भी नहीं लड़े, विधान परिषद के सदस्य हैं। फिर पार्टी के सामने उन्हें मंत्री बनाने की क्या मजबूरी थी? क्या इन्हें मंत्री बनाकर बीजेपी अपने ब्राह्मण वोटरों का ईगो शांत कर रही है? बीजेपी ही नहीं, पूरा एनडीए शाहबाद क्षेत्र के चारों जिलों, आरा, बक्सर, कैमूर और रोहतास में करीब-करीब साफ हो गया। सिर्फ आरा से अमरेंद्र प्रताप सिंह और इसी जिले की बड़हरा सीट से राघवेन्द्र प्रताप...

सीमांचल पर बीजेपी की निगाहें

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बीजेपी ने तारकिशोर प्रसाद को विधानमंडल दल का नेता बनाया है, उसका मकसद साफ है। सीमांचल की राजनीति में बीजेपी अब अपनी प्रभावी और सीधी मौजूदगी चाहती है। दूसरा यह कि अगर वह रामविलास पासवान की खाली हुई सीट पर सुशील मोदी को राज्यसभा में भेजती है तो तारकिशोर प्रसाद के बहाने पिछड़ों का जातीय समीकरण उसके साथ रहे। तारकिशोर प्रसाद जिस कटिहार सीट से जीतते हैं, वह पूर्णिया प्रमंडल में आती है। पूर्णिया प्रमंडल में चार जिले हैं, पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज। यही सीमांचल का इलाका है, जहां कभी किशनगंज वाले तस्लीमुद्दीन के बल पर राजद राज करता था, जो इस बार ओवैसी के पास है। इस इलाके में कहा जाता कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा चुनाव आते-आते एक ही हो जाता है-हिंदू-मुस्लिम। ओवैसी को बिहार विधानसभा की 5 सीटों पर मिली जीत भी इसकी तस्दीक करती है। अगर अनुभव ही विधानमंडल दल का नेता चुने जाने का आधार होता तो गया के प्रेम कुमार का दावा सबसे अधिक बनता था। वह आठवीं बार जीते हैं और पार्टी में अति पिछड़ा चेहरा भी हैं। इसी तरह पटना साहिब से सातवीं बार जीतने वाले नन्द किशोर यादव का दावा भी बनता, लेकिन उससे पार्टी क...