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सिकुड़ रहा है अखिलेश यादव के ‘परिवार’ का दायरा?

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अपर्णा यादव ने इस साल यूपी विधानसभा चुनाव के तुरंत पहले जब बीजेपी जॉइन की थी तब यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि अखिलेश अपना परिवार नहीं संभाल पाए। अब कानाफूसी यह हो रही है कि परिवार का सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए क्या मतलब है?  मुलायम सिंह यादव के निधन की वजह से मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव हो रहा है। अखिलेश यादव वहां पूरे मनोयोग से  कैंपेन में लगे हुए हैं। लगातार रैलियां कर रहे हैं। इस चुनाव के लिए उन्होंने आने चाचा शिवपाल सिंह यादव के सार्वजनिक रूप से पैर छुए। कहा जाता है कि इस इलाके में शिवपाल यादव का प्रभाव है। इसी समय रामपुर और खतौली विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव हो रहे हैं, जहां पार्टी प्रमुख होने के नाते अखिलेश यादव को जाना चाहिए था, लेकिन अभी तक नहीं पहुंचे हैं। उनका सारा फोकस मैनपुरी सीट पर है। यह तय करना आसान भी है और नहीं भी कि उनका उद्देश्य अपनी पत्नी को चुनाव जिताना है या मुलायम सिंह यादव की विरासत बचाना। इससे पहले आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में इसी परिवार के धर्मेंद्र यादव सपा से लड़ रहे थे। अखिलेश एक दिन भी प्रचार करने नहीं गए। नतीजे आए तो अखिलेश य...

बक्सर की पहचान क्या सिर्फ भगवान राम से है?

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श्रीराम कर्म भूमि यानी बक्सर। आजकल एक यज्ञ भी हो रहा है वहां, अयोध्या से निकली श्रीराम चरण पादुका यात्रा भी पहुंचेगी, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के माध्यम से बक्सर और अयोध्या सीधे जुड़ जाएंगे। लेकिन बक्सर की महत्ता क्या सिर्फ श्रीराम से है? ऐसा कहा जाता है कि सिद्धाश्रम जैसा तीर्थ न कभी हुआ है न होगा। अब सवाल यह है कि सिद्धाश्रम क्या है? सतयुग में जो सिद्धाश्रम था, त्रेता में वह वामनाश्रम, द्वापर में वेदगर्भापुरी और कलियुग में व्याघ्रसर हुआ। बक्सर इसी व्याघ्रसर का अपभ्रंश है। काशी, जिसे दुनिया का प्राचीनतम नगर माना जाता है, उसके बहुत पहले से यह स्थान आबाद था। यह मनोरम स्थान देव-दानव सभी को लुभाता था। शानदार वातावरण, मीठे जल की उपलब्धता और रसीले फलों के वृक्षों से भरा इलाका था यह। बहुत बाद में ऋषियों ने इसे तपस्या के लिए चुना। नारद, उद्दालक, भार्गव, गौतम, च्वयन जैसे ऋषि यहां तप करते थे। यहां नारद मुनि पहले से थे, श्रीराम बाद में महर्षि विश्वामित्र के साथ आए। बक्सर की गौरवमयी यात्रा में श्रीराम एक पड़ाव हैं। शहर में कई जगहों पर श्रीराम के धनुष का आकार के स्वागत द्वार बने हुए हैं, लेकिन स्थानीय ...

बिहार उपचुनाव, नतीजे उम्मीद के मुताबिक, पर संदेश गहरे हैं

बिहार में दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं हुआ। 50 फीसदी से कुछ प्रतिशत अधिक हुए मतदान में सत्ता नहीं बदलती, यह फॉर्म्युला कायम रहा। मोकामा सीट पर अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी और गोपालगंज सीट पर दिवंगत विधायक सुभाष सिंह की पत्नी कुसुम देवी विजयी रहीं। मोकामा में जीत जहां एकतरफा रही, वहीं गोपालगंज में लास्ट राउंड तक रोमांच बना रहा। गोपालगंज सीट पर भाजपा के पक्ष में परिस्थितियां थीं। नहीं तो बीजेपी वहां हार जाती। बीजेपी वहां 1794 वोटों से ही जीती। वहां बीएसपी कैंडिडेट इंदिरा यादव को 8854 मत मिले। इंदिरा यादव तेजस्वी यादव की सगी मामी हैं। उनके नहीं रहने पर यह वोट गठबंधन उम्मीदवार को जाता। एआईएमआईएम के अब्दुल सलाम को 12214 वोट मिले। मुस्लिम वोट बीजेपी को तो मिलने नहीं थे, ये भी राजद कैंडिडेट मोहन प्रसाद गुप्ता को मिलते, लेकिन उनके ये वोट कम हो गए। राजद ने बीजेपी का वैश्य वोट काटने के लिए मोहन गुप्ता को उतारा, यह रणनीति ठीक थी, लेकिन सफल नहीं हो पाई। वैश्य वोट बीजेपी का आधार वोट माना जाता है। लेकिन बड़ी बात है बीजेपी का वहां जीतना। इस समय बिहार में सभी दल एक गठबंधन मे...

कैसे-कैसे रावण !

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राम विमुख अस हाल तुम्हारा,  रहा न कुल कोऊ रोवनिहारा। मानस में तुलसी ने रावण वध के बाद के हालात पर यह चौपाई लिखी है कि राम से विमुख होने पर उसके वंश में कोई रोने वाला नहीं बचा। इसमें थोड़ी अतिश्योक्ति है, क्योंकि विभीषण चिरंजीवी हैं और वह रावण कुल के ही हैं। लेकिन राम से विमुख होने का नुकसान तो रावण को हुआ ही। राम जन-जन में हैं। चैता और चैती गीतों में हैं, कजरी में हैं, शादी के मंडप में बैठे दूल्हे में हैं, जोगियों के निर्गुण में हैं, सुबह-सुबह के अभिवादन में हैं, हारे के सहारे में हैं और श्मशान घाट की ओर जाते हुए सत्य का बोध कराने में हैं। राम ने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। सदैव दूसरों की मर्यादा का सम्मान किया। केवट प्रसंग के दौरान राम चाहते तो आराम से चलकर नदी पार कर जाते। केवट कहता है : एहि घाट तेँ थोरिक दूरि अहै कटिलौं जलथाह देखाइहौं जू इस घाट से थोड़ी ही दूर पर कमर तक पानी है, वहां से नदी पार कर जाइये। लेकिन राम को यहां गंगा की मर्यादा की चिंता है। उंस गंगा की, जो उनके चरणों से निकलकर शंकर की जटा में समाई हैं जिन चरणन से निकलि सुरसरि, शंकर जटा समाई जटाशंकरी नाम परयौ है त्र...

विरोधी दलों की बारात का दूल्हा कौन?

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अभी जो सीन बन रहा है, उसमें विपक्ष में 3 केंद्र दिख रहे हैं। एक नीतीश कुमार, दूसरे अरविंद केजरीवाल और तीसरे राहुल गांधी।  नीतीश कुमार कह रहे हैं कि वह विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री बनना उनका लक्ष्य नहीं है। लेकिन अगर वह प्रधानमंत्री की रेस में शामिल नहीं होंगे तो तेजस्वी यादव का क्या होगा? राजद ने क्या नीतीश कुमार को बिहार का सीएम बनाए रखने के लिए जदयू से गठबंधन किया है? इसका जवाब नहीं है। तो नीतीश कुमार कुछ भी कहें, उन्हें इस रेस में शामिल होना ही पड़ेगा, नहीं तो राजद उन्हें बहुत दिनों तक सपोर्ट नहीं करेगा। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की दो राज्यों, दिल्ली और पंजाब, में सरकार है। बाकी जितने क्षेत्रीय दल हैं, वे पक्ष में हों या विपक्ष में, एक ही राज्य तक सिमटे हुए हैं। कुछ दिनों पहले से अरविंद केजरीवाल देश की बात करने लगे हैं। हरियाणा के हिसार से उनका देश को नम्बर वन बनाने का अभियान शुरू हो चुका है। नरेंद्र मोदी के खिलाफ वह 2014 में बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं। अति आकांक्षा भी उनके अंदर है। तो वह खुद को पीएम की दौड़ से कैसे बाहर कर लेंगे? इसके बाद हैं राहुल...

क्या कास्ट पॉलिटिक्स की ओर लौट रही है बीजेपी?

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जाटों को कितना साध पाएंगे भूपेंद्र यूपी विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद कहा जाने लगा था कि बीजेपी पहले जाति यानी कास्ट को धर्म से काउंटर करती थी अब इसे क्लास के हथियार से टक्कर दे रही है। हाल के दिनों में पार्टी ने ऐसे कई फैसले लिए जिससे ऐसा लगने लगा है कि बीजेपी कास्ट पॉलिटिक्स की ओर लौट रही है। बीजेपी ने यूपी का प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी को बनाया है जो जाट हैं। किसान आंदोलन के समय से और तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद भी धारणा यही रही कि जाट बीजेपी के खिलाफ हैं। हालांकि इसी साल हुए यूपी विधानसभा के चुनाव में बीजेपी ने हापुड, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और बुलंदशहर समेत कई जिलों की सभी सीटें जीत ली थी। यह तब था जबकि कहा यह जाता था कि जाट बीजेपी के खिलाफ हैं। जाट पश्चिमी यूपी में प्रभावी हैं, बीजेपी की सीटें कुछ कम हुईं, लेकिन किसान आंदोलन में सिर्फ जाट ही शामिल नहीं थे। बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है और प्रदेश के किसी भी हिस्से से वह अपना अध्यक्ष चुन सकती है लेकिन जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाने के बाद भूपेंद्र चौधरी को यूपी भाजपा का अध्यक्ष बनाने से ऐसा...

कहे घाघ कुछ होनी होई

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दिन के बद्दर, रात निबद्दर बहे पुरवइया झब्बर-झब्बर कहे घाघ कुछ होनी होई कुआं के पानी धोबी धोई। यह कहावत सावन के महीने के लिए है। दिन में आकाश बादलों से ढंका रहे और रात में आसमान साफ रहे, साथ में पुरवा हवा ललकारे, तो ये अकाल के लक्षण हैं। ताल तलैया सूख जाएंगे और धोबी को कपड़े धोने के लिए कुएं के पानी का इस्तेमाल करना पड़ेगा। इसको सपोर्ट करती दूसरी कहावत है दिन में बदरी, रात में ओस कहे घाघ बरखा सौ कोस इसका अर्थ भी वही है कि दिन में बादल छाए रहे और रात में आसमान साफ हो तो सौ कोस यानी दूर-दूर तक बारिश के आसार नहीं हैं। सावन में पुरुवा हवा कजरी गीतों में ही अच्छी लगती है। हकीकत में सावन में पुरवइया अकाल का संदेश लाती है। सावन मास बहे पुरवइया बरधा बेच ले आव गईया यानी सावन के महीने में लगातार पुरुवा हवा चले तो खेती में कुछ नहीं बचता। इसलिए वैकल्पिक इंतज़ाम कर लेना चाहिए। घर में पैसे न हों तो बैलों को बेच कर गाय खरीद लेनी चाहिए, ताकि साल भर उसका दूध बेचकर परिवार पाला जा सके।